अपनी बात

अलोक शुक्‍ला

किसी भी नई साहित्यिक पत्रिका के सामने बहुत सी चुनौतियां होती है - वलय के सामने भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती अच्‍छी और मौलिक रचनाएं प्राप्‍त करने की है। यूं तो हमें बहुत से लेखकों की रचनाएं मिलींं, परन्‍तु स्‍तरीय रचनाएं खोजना अभी भी हमारे लिये एक समस्‍या है। इसीलिये वलय के संपादक मंंडल ने फैसला किया है, कि हम फिलहाल वलय को मासिक के स्‍थान पर त्रैमासिक रखेंगे, जिससे हम अच्‍छी और स्‍तरीय रचनाओं का ही प्रकाशन करें। कुछ समस्‍या धनाभाव की भी है। मैं क्रैसिव सल्‍यूशन्‍स और आदित्‍य की जितनी भी तारीफ करूं कम है।वे बिना किसी आर्थिक सहायता और बिना व‍िज्ञापन के भी वलय के प्रकाशन में जी जान से लगे हैं।

मुझे खुशी है कि 2 माह की अवधि में हम वलय के इस अंक के ल‍िये बड़ी अच्‍छी कहानियां और कविताएं प्राप्‍त कर सके हैं। सभी लेखकों को मेरी ओर से धन्‍यवाद और साधुवाद है। वलय प्रारंभ से ही सामाजिक सरोकारों के प्रत‍ि सजग है। साहित्‍य को पूरी तरह से राजनीति मुक्‍त बनाना संभव नहीं है, क्‍योंकि वैचारिकता और दृष्टिकोण ही साहित्‍यकार को रचना करने के लिये प्रर‍ित करते हैं। फिर भी हमने प्रयास क‍िया है क‍ि वलय में प्रकाश‍ित रचनाएं दलगत राजनीति से दूर हों। भविष्‍य में भी सामाज‍िक सरोकारों के प्रत‍ि सजग रहते हुए, हमारा यह प्रयास जारी रहेगा।

मैं अपने सभी लेखक साथियों से अनुरोध करता हूं क‍ि वे अच्‍छी और मौल‍िक रचनाएं वलय मे प्रकाशन के ल‍िये भेजते रहें। व‍िशेषकर नये लेखकों से अनुरोध है क‍ि वे अपनी रचनाएं अवश्‍य भेजें। हमारा वादा है कि उन्‍हें हमारी ओर से संपादकीय सहयोग मिलता रहेगा।

एक बार पुन: सभी का हृदय से धन्‍यवाद करता हूं।

 

आलोक शुक्‍ला



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अंक

Image Credit :- Dr. Harshjeet Singh Bal


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